Alumni Association of JNV Naichana, Rewari (HR)

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Pradeep Praveer, SDM, HCS (1993-2000)

Posted by JNV-AAN on July 16, 2020 at 10:00 AM Comments comments (1)


Hello Friends,

My name is Pradeep Kumar and I am 1994-2000 passout from JNV Rewari. Presently, I am serving as SDM Firozepur Jhirka and CEO Zila Parishad & DRDA thorugh Haryana Civil Services. After passing out from JNV Rewari, I joined Indian Air Force as an Airman to meet livelihood demands of family as my father was a daily wage labour. Also, Air Force gave me chance to serve my nation. It provided me a good platform for future. Life in Indian Air Force added to qualities like discipline, commitment, team work, respect to composite culture, tolerance and never say die attitude (NSD), empathy towards weaker sections, which were already inculcated by Navodayan life. Here, I completed my B.A. Honours from Sociology and M.A. Sociology both from IGNOU due to regular nature of service. But, values learnt in JNV life continuously motivated me to further excel in life.

So, I started preparing for Civil Services along with my service. In the year 2011, I joined SBI as Probationary Officer but work does not seem interesting to me. So, I resigned from banking service. During this time I qualified NET-JRF by UGC in Sociology. Reason for this was to look out for an alternative career which can provide me livelihood source and also leisure time to do Civil service preparation. Life was full of struggles again as i took risk of taking coaching in Delhi with no Job. Parents were also not in a position to help me. But many of Nvaodayan and Air force friends helped me by providing financial help also. Values learned at JNV and at Air Force made to be self motivated during these adversaries

New Phase of my life started when I joined Jawaharlal Lal University as JRF research scholar. This was 2nd breakthrough in my life, 1st was admission to JNV. JNU provided cheaper and quality world class education. It gave me academic and argumentative rigour in my personality. In the year 2013 I was selected in Haryana Civil Services as BDPO. I Appeared for IAS Mains from 2013 to 2017 and faced interview 2 times. I was selected in UPSC Civil services exam in year 2016 and got 936 Rank in this. During this, period I was again selected in Haryana civil Services with SDM this time. Due to low rank in UPSC CSE, I preferred to serve in my home state. My service in civil services gives me high level of satisfaction due to its ‘Pay back to society’ theme and also due to its diversity of work.

 

Passion to profession

Posted by Amit yadav on May 13, 2020 at 5:40 AM Comments comments (1)
Hii Ye meri phli post about myself. Mera naam Amit h or m JNV rewari haryana me batch 2004-11 student rha hu. Mene kaafi saari post dekhi or padhi h apne is group me bhi or dusri jgh pr bhi. But bhut kaam hi asi hogi jo kisi average student ki hogi ya tho mostly talented bnde rhe h sb ya khi na khi bhut achi jgh pr posted h Yha pr m apne baare me bhi kuvh share krna chahunga M koi topper ya bilkul 0 students me nhi rha m mostly bhaiyo ki trh ek average student rha hu. Or jaisa ki aap sb jante h average students ki life same wase hi hoti h jaisi ki apni society me ek middle class ki. Kyuki hmesa hi ek average student ko bhut saari chijo ko face krna pdta h like unke parents bhi hope rkhte h ki syd hmara bacha or acha kr skta h or aage nikl skta h or issi pressure me wo baacha apna best de bhi nhi paata h or hmesa ghut ghut kr jeene pr majbur ho jaata h Jaise jaise time nikla 12 ho gyi or fr aaya dunaiya ko face krne ka time. Jaisa ki btaya h average rha hu tho ab struggle krne ki.baari yha pr bhi hi. Parent's ki baat maankr unke acc ka subject choose krta hu ya apne dil ki awaj sunkr apni pasand ka. Time k sath graduation ho gyi bt maan khush nhi rhta the kyuki science stream thi or maths mujhe kbi pasand nhi rha mera intrst tho art n drawing me tha . Graduation tk tho mujhe bhi nhi smjh aata tha ki art ya drawing me koi scope bhi h ya nhi ya bs ye passion tk bnkr rh jayga mera. Jb mujhe pta chla ki is field me bhi aage kaafi scope h even ek engineer ya ek company me 8 hrs ki duty krne ki jgh m wha kaam krna jyada pasand krta jha pr mujhe khushi milti isliye mene fr se graduation krni chahi wo bhi abki baar us field me jisme mera intrst tha. Mene entrance exam diya "COLLEGE OF ART, DELHI UNIVERSITY" me applied arr department k liye bt competition jyada or seats total hi 80 Nhi hua. Bt himmt ni haari next year fr try kiya or is baar meri mehnat rang laayi or mera selections ho gya. Ya baat selection ya pass hone ki nhi yha mere khne ka mtlv h ki wo khushi btayi nhi jaa skti h jo apko apki pasand ka kaam krne ko mil jaaye usme hoti h. Meri dual graduation hui OR abhi 1 saal hone ko passout hue or m khushi hu ki m aaj wo kaam kr rha hu jo muhhe such me khushi deta h or even yha m ye baat btana chaunga ki aapki income bi achi kaashi hoti h like a engineer or a teacher. Bdw m working as Freelancer graphic designer n m really Happie wit mine job. Finally m bs itna khna chahunga ki kisi ko bbi pressure me aakr wo choose nhi krna chaheye jisme intrst hi na ho wrna hmesa ghut ghut pr jeena pd jaata h h . Aapko jo pasand h wo kro fr chahe wo art , music , theatre ya koi bhi field ho aaj k time hr jgh scope h even bht ache ache kaam h jo aapko such me khushi denge. Change ur passion into profession

Sumit Yadav (1999-06), Youth Coordinator (Raj), Ex GST Inspector

Posted by JNV-AAN on May 1, 2020 at 2:15 AM Comments comments (2)

नवोदय में मेरा पहला दिन/ मेरी पहली याद

 

09.09.99 यह तारीख है, वह तारीख जिस दिन हम/ हमारा बैच नवोदय में आया। स्पेशल डेट लग रही है ना, 08.09.99 होती तो भी हमारे लिए तो स्पेशल रहने वाली ही थी। कुछ दोस्त जो तब पहली बार मिले थे और आज भी साथ हैं, वो भी इस तारीख के जितने ही स्पेशल हैं। लेकिन उस दिन तो इतना खुश नहीं था, शायद बिल्कुल भी नहीं, सच कहूं तो रोने का ही मन कर था। मनमोहन भाई, मेरे से एक साल सीनियर बैच से थे, मेरे बेड से बगल वाला बेड। वो भी छोटे ही थे पर शायद एक साल के अनुभव ने बड़ा बना दिया था, शायद समझ पा रहे होंगे की क्या चल रहा है मेरे अंदर इसलिए कोशिश कर रहे थे ख्याल रखने की थैंक यू मनमोहन भाई आपने बहुत ख्याल रखा क्योंकि ज्यादातर ड्यूटी साथ ही रहती थीं, मेरी नवोदय लाइफ के पहले यादगार किरदार।

 

अब दूसरे किरदार पर आते हैं, गिरधारी लाल सर। खड़ूस ही समझते थे उनको हम लोग शायद 7 साल बाद भी, शायद वो थे भी। लेकिन उनकी पहली याद तो बिल्कुल भी खड़ूस नहीं है। अगले दिन सुबह सबको जल्दी उठकर PT के लिए जाना था, हम तो घर पर नवजादे रह चुके थे जाहिर है नहीं उठ पाया, लेकिन जब आंख खुली तो देखा गिरधारी सर उठाने के लिए गोद में लेकर घूम रहे हैं। लव यू सर। खड़ूस जरूर लिखा था पर एक बात जो हमेशा याद रह जाती है वह ये है कि उन्होंने कभी हाथ नहीं उठाया या शायद मुझे याद भी नहीं है, उठाया होगा तो भी शायद जब उनके पास यही विकल्प बैचा हो तब। सर का नवोदय स्कूल से और साथ है बच्चों से दिल से लगाव था। लव यू वंस अगैन टू गिरधारी सर। ये थीं नवोदय में मेरी पहली यादें। भगवान से यही प्रार्थना है कि मुझे नवोदय का अपना ऋण उतारने का मौका दें।

 

परिचय देना शेष रह गया, मैं सुमित यादव 1999-2006 बैच। उपलब्धियां - MBA Finance (NET Qualified) पूर्व सेंट्रल जीएसटी इंस्पेक्टर, वर्तमान में जिला युवा समन्वयक, नेहरू युवा केन्द्र संगठन अंडर मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स। उपलब्धियां इसलिए बता रहा हूं कि बाहर वालों के लिए शायद सच में ये उपलब्धियां हैं, लेकिन नवोदय के साथियों की तुलना में तो मैं बहुत ही औसत विद्यार्थी था क्योंकि सब ही तो वहां एक से बड़े धुरंधर थे। मेरी सबसे बड़ी और सबसे यादगार उपलब्धि है, और शायद हमेशा रहेगी नवोदय में मेरा चयन क्योंकि वहां कोई औसत बच्चा नहीं जाता, हम नवोदयन कुछ भी कर सकते हैं बस जरूरत होती है सही दिशा की सिर्फ। धन्यवाद साथियों।



Kusum Yadav (1998-05 Batch), Educationalist

Posted by JNV-AAN on April 5, 2020 at 8:15 AM Comments comments (5)


मेरा छोटा सा सफरनामा 

रेवाड़ी से कुछ ही दूरी पर गांव मसानी में जन्मी कुसुम बचपन से नटखट और शरारती थी, 3 बहन भाईयो में सबसे बड़ी होने के नाते घर में सबकी लाडली थी लेकिन होश संभालते ही दादा निहाल सिंह (ex army man), kusum की नजदीकी थी, कुसुम को बहुत ही लाड प्यार से रखते थे और कुसुम भी ज्याातर दादा जी के पास ही खेलती कूदती थी. वक्त गुजरता गया और 5 साल की होते ही कुसुम को गांव में ही सरकारी स्कूल में दाखिला दिला दिया, चंचल और नटखट होने के बाद भी पढ़ने में होशियार थी और इसी लिए ज्यादा तर स्कूल स्टाफ कुसुम को प्यार करता था, वक्त के साथ साथ क्लास भी बढ़ती गई और 5 वीं में पहुंचते पहंचते कुसुम समझ दार और क्लास में पढ़ाई में सबसे होश्यार हो गई थी, इसी के चलते नवोदय विद्यालय नेचाना में 6th दाखिला लेने के लिए फॉर्म भर दिया, और बग़ैर किसी ट्यूशन के ही कुसुम ने एग्जाम पास कर लिया. इस उपलब्धि पर कुसुम मन ही मन बहुत खुश थी लेकिन साथ ही साथ थोड़ा उदास भी थी कि दादा जी और परिवार से अलग हो रही थी।

स्कूल में पहला दिन अजीब ख़्याल मन में चल रहे थे, जैसा सोचा था उसके बिल्कुल उलट था रहने के लिए पुराने टेंट और पढ़ने के लिए पुराने टेंट जैसे घर , कुल मिलाकर स्कूल कम रैन बसेरा ज्यादा लग रहा था,।लेकिन कुसुम अकेली तो थी नहीं और भी लडके और लड़कियां थी और कुछ दिन उदास रहने के बाद धीरे धीरे सब ठीक लगने लग गया और प्रिंसीपल मैथ्यू सर ने सब कुछ मैनेज कर लिया।

समय के साथ साथ सब ठीक ठाक गुजरता गया और कुसुम पढ़ाई में होशियार थी और बाकी गतिविधियों में भी रुचि रखती थी, और खेल कूद में भी काफी रुचि लेती थी। अपने हम उम्र के छात्र-छात्राओं में दौड़ने और ऊंची कूद में श्रेष्ठ थी। लेकिन जैसे ही आठवीं कक्षा में पहुंची , एक दिन मैदान में गिरने से पैर में फ्रैक्चर हो गया जिसकी वजह से 9 महीने घर पर बिस्तर पर गुजारने पड़े। एक श्रेष्ठ एथलीट बनने का सपना जैसे टूट ही गया । लेकिन उसने हार नहीं मानी और 9वी क्लास में लीना सिंह मैडम की देख रेख में कुसुम और कुछ लड़कियों ने हैंडबॉल कि एक टीम बनाई और नया स्कूल बनने के बाद मेहनत शुरू कर दी थी, कहते हैं ना कि मेहनत और लगन से सब मुमकिन है और 10 वीं तक पहुंचते पहंचते कुसुम ने एक अच्छी खासी हैंडबॉल की टीम तैयार कर ली थी। और साथ साथ पढ़ाई में भी सब कुछ ठीक ठाक था। बोर्ड की क्लास थी इसलिए खेल पर कम पढ़ाई पर ज्यादा जोर था और एग्जाम हुए और कुसुम ने मेरिट मे अंक प्राप्त किए , लेकिन कुसुम थोड़ी उदास थी उसको और ज्यादा अंक मिलने की उम्मीद थी।

अगली क्लास में दाखिला होता है और एक अलग ही एहसास था सब बदला बदला ऐसा लग रहा था कुसुम अब बड़ी हो गई है चमकता चेहरा, एक अलग जोश बहुत कुछ करने का जज़्बा लेकर नई शुरुआत होती है और समय गुजरता रहता है, शरारतें बढ़ जाती है। खेल में भी रुचि और बढ़ जाती है और 12 वीं तक पहुंचते पहुंचते स्कूल की सबसे तेज़ तर्रार एथलीट बन जाती है। 12 वीं बोर्ड ऊपर से साइंस स्ट्रीम के बोझ के बावजूद भी प्रदर्शन में कमी नहीं और खेल प्रतियोगिता में स्कूल टीम की अगुवाई करते करते जयपुर रीजन की अगुवाई की ओर जयपुर रीजन को राष्ट्रीय हैंडबॉल चैंपियन 2005 बनवा कर ही दम लिया और कुछ दिन बाद 12 वीं के एग्जाम हुए और अच्छे खासे अंक हासिल करके कुसुम स्कूल को अलविदा कह गई और छोड़ गई तो सिर्फ अपनी यादे ओर जूनियर लड़कियों के लिए प्रेरणा।।

कुसुम ने अपनी अगली पारी की शुरुवात केएलपी कॉलेज रेवाड़ी से शुरू की। यहां तक आते आते कुसुम एक बिंदास निडर और जवान लड़की बन चुकी थी और कॉलेज मे भी कुसुम ने पढ़ाई खेल कूद ओर अतिरिक्त गतिविधियों में भी कॉलेज का खूब नाम किया और कॉलेज के दौरान कुसुम की ज़िन्दगी में थोड़ा विराम लगा जब स्नातक के फाइनल क्लास में पहुंचते पहुंचते कुसुम की शादी कर दी गई, लेकिन शादी भी कुसुम के हौसलों को कम नहीं कर पाई और वह ज़िंदगी में आगे बढ़ती गई और उसके ससुराल वालों ने भी उसका हमेशा मनोबल बढ़ाया। कॉलेज के बाद यूनिवर्सिटी और फिर नौकरी, कुसुम ने कहीं भी पीछे मुड कर नहीं देखा और साथ साथ तीन बच्चे भी हैं जो बहुत ही सुन्दर ओर नटखट और अपनी मां कुसुम जैसे ऑलराउंडर।

कुसुम कई सरकारी नौकरी छोड़ कर अब विधि विषय में पीएचडी कर रही है और MDU रोहतक में लॉ फैकल्टी में पढ़ाती है और आगे पढ़ने को तत्पर कुछ कर गुजरने के हौसले को संजोये, जरूरतमंदो की मदद कर अपनी ज़िन्दगी जी रही है। कुसुम के लिए पैसा या नाम मायने नहीं रखता , बल्कि कोई काम दिल ओर दिमाग को तसल्ली दे बेहतर समझती है। ईश्वर अललाह कुसुम को ज़िन्दगी में हमेशा कामयाब करे ओर आसमान की बुलंदियों तक पहुचाएं और हमेशा ख़ुश रखे।।



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