Alumni Association of JNV Naichana, Rewari (HR)

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"Navodaya" Teri Yaad Bada Satati Hai

Posted by JNV-AAN on July 26, 2020 at 11:50 AM Comments comments (0)

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं...

 

याद हैं तेरी वो 4 की सिटी, हर रोज मेरे सपने तोड़ मुझे जगाती थी.

अब तो रात गुजर जाती हैं खुलीं आँखों मे, सपने अब भी हैं पर नींद कहाँ आती हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

याद हैं तेरे वो पोहे और पूरी कि लाइने, जिसके लिए हम दुबारा भी लड़ जाते थे.

अब तो बेहिसाब हैं खाने को हमें, पर ना जाने हम क्यों भूखे ही रह जाते हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

याद हैं तेरी घंटो की पढ़ाई, जिससे बचने अक्सर मेडिकल रूम मे पाए जाते थे.

अब तो रट ली हैं सैकड़ो किताबें, पर तेरे क्लास की बेंचे अब भी मुझे बुलाती हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

वो लड़कपन का प्यार भी तो यहीं मिला था, जिससे अक्सर छुप छुप हमने नजरें मिलायी थी.

अब तो कितने डेटिंग एप्प हैं यहाँ, पर वो निश्छल और मासूम आंखे कहाँ मिल पाती हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

वो छोटे छोटे निक्करो मे कितनी दौड़ लगायी हैं, और पेट पकड़ कितनी दफा बीमारी के नखरे दिखाए हैं.

अब तो दूर निकल आये हैं जिंदगी की दौड़ मे, पर शिकायते हमारी कहाँ कोई सुन पाता हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

याद हैं तेरी खातिर हम जान लगा देते थे, जीतने को तेरे नाम की ट्रॉफी हर दावं लगा देते थे.

अब तो बड़ी जीत भी फीकी ही लगती हैं, कि कहाँ कोई अब मिलके जश्न मनाता हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

याद हैं हमारे हाउस मे कितनी तनातनी थी, कभी मैं हार रो पड़ता था तो कभी तुझको रुला जाता था.

अब कहाँ रह गयी वो दुश्मनी नवोदय की, अब तो नाम सुन किसी नवोदयन का हम दौड़ भाग के आते है।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

 

उन चार दीवारों मे आजादी के कितने विद्रोह हुए, जो अक्सर हाउस मास्टर के आने पे दमन हो जाते थे.

अब तो रोज़ दुआ करते हैं खुदा से, कि कैद करलो वापस हमें हम हाथों मे खुद ज़ंज़ीर लिए बैठे हैं।

नवोदय तेरी याद बड़ा सताती हैं..

Pradeep Praveer, SDM, HCS (1993-2000)

Posted by JNV-AAN on July 16, 2020 at 10:00 AM Comments comments (1)


Hello Friends,

My name is Pradeep Kumar and I am 1994-2000 passout from JNV Rewari. Presently, I am serving as SDM Firozepur Jhirka and CEO Zila Parishad & DRDA thorugh Haryana Civil Services. After passing out from JNV Rewari, I joined Indian Air Force as an Airman to meet livelihood demands of family as my father was a daily wage labour. Also, Air Force gave me chance to serve my nation. It provided me a good platform for future. Life in Indian Air Force added to qualities like discipline, commitment, team work, respect to composite culture, tolerance and never say die attitude (NSD), empathy towards weaker sections, which were already inculcated by Navodayan life. Here, I completed my B.A. Honours from Sociology and M.A. Sociology both from IGNOU due to regular nature of service. But, values learnt in JNV life continuously motivated me to further excel in life.

So, I started preparing for Civil Services along with my service. In the year 2011, I joined SBI as Probationary Officer but work does not seem interesting to me. So, I resigned from banking service. During this time I qualified NET-JRF by UGC in Sociology. Reason for this was to look out for an alternative career which can provide me livelihood source and also leisure time to do Civil service preparation. Life was full of struggles again as i took risk of taking coaching in Delhi with no Job. Parents were also not in a position to help me. But many of Nvaodayan and Air force friends helped me by providing financial help also. Values learned at JNV and at Air Force made to be self motivated during these adversaries

New Phase of my life started when I joined Jawaharlal Lal University as JRF research scholar. This was 2nd breakthrough in my life, 1st was admission to JNV. JNU provided cheaper and quality world class education. It gave me academic and argumentative rigour in my personality. In the year 2013 I was selected in Haryana Civil Services as BDPO. I Appeared for IAS Mains from 2013 to 2017 and faced interview 2 times. I was selected in UPSC Civil services exam in year 2016 and got 936 Rank in this. During this, period I was again selected in Haryana civil Services with SDM this time. Due to low rank in UPSC CSE, I preferred to serve in my home state. My service in civil services gives me high level of satisfaction due to its ‘Pay back to society’ theme and also due to its diversity of work.

 

Kusum Yadav (1998-05 Batch), Educationalist

Posted by JNV-AAN on April 5, 2020 at 8:15 AM Comments comments (5)


मेरा छोटा सा सफरनामा 

रेवाड़ी से कुछ ही दूरी पर गांव मसानी में जन्मी कुसुम बचपन से नटखट और शरारती थी, 3 बहन भाईयो में सबसे बड़ी होने के नाते घर में सबकी लाडली थी लेकिन होश संभालते ही दादा निहाल सिंह (ex army man), kusum की नजदीकी थी, कुसुम को बहुत ही लाड प्यार से रखते थे और कुसुम भी ज्याातर दादा जी के पास ही खेलती कूदती थी. वक्त गुजरता गया और 5 साल की होते ही कुसुम को गांव में ही सरकारी स्कूल में दाखिला दिला दिया, चंचल और नटखट होने के बाद भी पढ़ने में होशियार थी और इसी लिए ज्यादा तर स्कूल स्टाफ कुसुम को प्यार करता था, वक्त के साथ साथ क्लास भी बढ़ती गई और 5 वीं में पहुंचते पहंचते कुसुम समझ दार और क्लास में पढ़ाई में सबसे होश्यार हो गई थी, इसी के चलते नवोदय विद्यालय नेचाना में 6th दाखिला लेने के लिए फॉर्म भर दिया, और बग़ैर किसी ट्यूशन के ही कुसुम ने एग्जाम पास कर लिया. इस उपलब्धि पर कुसुम मन ही मन बहुत खुश थी लेकिन साथ ही साथ थोड़ा उदास भी थी कि दादा जी और परिवार से अलग हो रही थी।

स्कूल में पहला दिन अजीब ख़्याल मन में चल रहे थे, जैसा सोचा था उसके बिल्कुल उलट था रहने के लिए पुराने टेंट और पढ़ने के लिए पुराने टेंट जैसे घर , कुल मिलाकर स्कूल कम रैन बसेरा ज्यादा लग रहा था,।लेकिन कुसुम अकेली तो थी नहीं और भी लडके और लड़कियां थी और कुछ दिन उदास रहने के बाद धीरे धीरे सब ठीक लगने लग गया और प्रिंसीपल मैथ्यू सर ने सब कुछ मैनेज कर लिया।

समय के साथ साथ सब ठीक ठाक गुजरता गया और कुसुम पढ़ाई में होशियार थी और बाकी गतिविधियों में भी रुचि रखती थी, और खेल कूद में भी काफी रुचि लेती थी। अपने हम उम्र के छात्र-छात्राओं में दौड़ने और ऊंची कूद में श्रेष्ठ थी। लेकिन जैसे ही आठवीं कक्षा में पहुंची , एक दिन मैदान में गिरने से पैर में फ्रैक्चर हो गया जिसकी वजह से 9 महीने घर पर बिस्तर पर गुजारने पड़े। एक श्रेष्ठ एथलीट बनने का सपना जैसे टूट ही गया । लेकिन उसने हार नहीं मानी और 9वी क्लास में लीना सिंह मैडम की देख रेख में कुसुम और कुछ लड़कियों ने हैंडबॉल कि एक टीम बनाई और नया स्कूल बनने के बाद मेहनत शुरू कर दी थी, कहते हैं ना कि मेहनत और लगन से सब मुमकिन है और 10 वीं तक पहुंचते पहंचते कुसुम ने एक अच्छी खासी हैंडबॉल की टीम तैयार कर ली थी। और साथ साथ पढ़ाई में भी सब कुछ ठीक ठाक था। बोर्ड की क्लास थी इसलिए खेल पर कम पढ़ाई पर ज्यादा जोर था और एग्जाम हुए और कुसुम ने मेरिट मे अंक प्राप्त किए , लेकिन कुसुम थोड़ी उदास थी उसको और ज्यादा अंक मिलने की उम्मीद थी।

अगली क्लास में दाखिला होता है और एक अलग ही एहसास था सब बदला बदला ऐसा लग रहा था कुसुम अब बड़ी हो गई है चमकता चेहरा, एक अलग जोश बहुत कुछ करने का जज़्बा लेकर नई शुरुआत होती है और समय गुजरता रहता है, शरारतें बढ़ जाती है। खेल में भी रुचि और बढ़ जाती है और 12 वीं तक पहुंचते पहुंचते स्कूल की सबसे तेज़ तर्रार एथलीट बन जाती है। 12 वीं बोर्ड ऊपर से साइंस स्ट्रीम के बोझ के बावजूद भी प्रदर्शन में कमी नहीं और खेल प्रतियोगिता में स्कूल टीम की अगुवाई करते करते जयपुर रीजन की अगुवाई की ओर जयपुर रीजन को राष्ट्रीय हैंडबॉल चैंपियन 2005 बनवा कर ही दम लिया और कुछ दिन बाद 12 वीं के एग्जाम हुए और अच्छे खासे अंक हासिल करके कुसुम स्कूल को अलविदा कह गई और छोड़ गई तो सिर्फ अपनी यादे ओर जूनियर लड़कियों के लिए प्रेरणा।।

कुसुम ने अपनी अगली पारी की शुरुवात केएलपी कॉलेज रेवाड़ी से शुरू की। यहां तक आते आते कुसुम एक बिंदास निडर और जवान लड़की बन चुकी थी और कॉलेज मे भी कुसुम ने पढ़ाई खेल कूद ओर अतिरिक्त गतिविधियों में भी कॉलेज का खूब नाम किया और कॉलेज के दौरान कुसुम की ज़िन्दगी में थोड़ा विराम लगा जब स्नातक के फाइनल क्लास में पहुंचते पहुंचते कुसुम की शादी कर दी गई, लेकिन शादी भी कुसुम के हौसलों को कम नहीं कर पाई और वह ज़िंदगी में आगे बढ़ती गई और उसके ससुराल वालों ने भी उसका हमेशा मनोबल बढ़ाया। कॉलेज के बाद यूनिवर्सिटी और फिर नौकरी, कुसुम ने कहीं भी पीछे मुड कर नहीं देखा और साथ साथ तीन बच्चे भी हैं जो बहुत ही सुन्दर ओर नटखट और अपनी मां कुसुम जैसे ऑलराउंडर।

कुसुम कई सरकारी नौकरी छोड़ कर अब विधि विषय में पीएचडी कर रही है और MDU रोहतक में लॉ फैकल्टी में पढ़ाती है और आगे पढ़ने को तत्पर कुछ कर गुजरने के हौसले को संजोये, जरूरतमंदो की मदद कर अपनी ज़िन्दगी जी रही है। कुसुम के लिए पैसा या नाम मायने नहीं रखता , बल्कि कोई काम दिल ओर दिमाग को तसल्ली दे बेहतर समझती है। ईश्वर अललाह कुसुम को ज़िन्दगी में हमेशा कामयाब करे ओर आसमान की बुलंदियों तक पहुचाएं और हमेशा ख़ुश रखे।।


"Dard Manjta Hai"

Posted by JNV-AAN on April 2, 2020 at 10:35 AM Comments comments (0)

'Dard Manjata Hai' is a story collection! Almost every face of society is present in this collection. 'Mere Bhagwan' has the development of social values, has a naive character like Vanshi Lal, while 'Chadm' has Ranjit Dutt's deceit, Khal's culmination. In the midst of the terrible pain of the Latur earthquake, a tiny seed of faith and love grows, in the 'pain it pleases', but in 'Ek Tera Hi Saath', the hero's faith is violated and then the generosity and sublime nature of love Looks The 'deprived' hero finds himself trapped in the arrogance he creates for his ash and fun. 'Situations' is a story of conflict and disjunction between the difficulties arising in the tragedy and human capacities. One should not wait for 'train, bus and girl', because one goes and the other comes, this story of self satisfaction Realizes. Flattery prevailing in the government system, The depiction of stagnation and planned corruption is in 'Rajkaj'. The 'paper justice' questions and paines the impracticality and order of the rules, laws, and pain. The revenge for a snowy cold and sweet poison that takes place in the village amidst the scouring, shattering values ​​of the land grab.

 You may read about author here:

 Rannvijay was born in April 1977 in a village in Faizabad, Uttar Pradesh. Bachpan lived amidst the immortals of the village and the lush fields. Dhanvi Rijvijay of Medha was selected to study in Jawahar Navodaya Vidyalaya and topped the school. He was awarded the Merit Certificate in Mathematics by the cbse board. B Tech from Pant Nagar University located in the beautiful lanes of Nainital from 1994 - 1998. He was a pioneer in the literary and creative activities of the university. He was selected in the Indian Engineering Service, uppcs, 1999 and the Indian Civil Service in 2001. He selected Hindi literature as an elective subject in the Administrative Services examination.

 He has worked in various divisions, cities of the Ministry of Railways, Government of India. He has vast experience in the areas of railway operations, traffic planning, infrastructure projects, construction, research etc. He is currently serving as Director at RDSO Lucknow. His writings have been published in various journals and magazines till date. His stories will include writers such as Premchand, Nirmal Verma and Mohan Rakesh. Some stories run concurrently on several levels and many seem to be composite works of fiction. In many places new experiments will appear in the story mode. The end of a story will surprise you like Chekhav's stories.



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